June 17, 2021

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नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर किया गोष्ठी का आयोजन

औरैया। (डीवीएनए) सरस्वती विद्या मंदिर इण्टर कॉलेज दिबियापुर में मंगलवार को नई शिक्षा नीति पर गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस मौके पर मुख्य वक्ता व भौतिक विज्ञान के पूर्व प्रवक्ता गुरु नारायण अग्रवाल ने कहा कि हमें सफल, अनुकरणीय एवं उत्पादक छात्रों का निर्माण करना है।
इससे पूर्व गोष्ठी का शुभारंभ मुख्य अतिथि आत्मानन्द सिंह प्रदेश निरीक्षक विद्या भारती कानपुर प्रांत , अध्यक्ष डॉ एमपी शुक्ल पूर्व प्राचार्य, मुख्य वक्ता गुरु नारायण अग्रवाल एवं प्रधानाचार्य नवीन कुमार अवस्थी ने दीप प्रज्वलन कर किया गया।
अरुण कुमार तिवारी प्रधानाचार्य जनता इण्टर कॉलेज, अरियारी ने कहा कि मूल्यपरक शिक्षा होनी चाहिए । बाल केंद्रित शिक्षा के ऊपर भी विचार व्यक्त किए। कृष्ण कुमार वर्मा ने बेसिक शिक्षा, आंगनबाड़ी केंद्रित शिक्षा पर प्रकाश डाला। 
उन्होंने कहा की  6 वर्ष तक  बच्चों का 85फीसदी तक मानसिक  विकास हो जाता है तो हमें प्रारंभिक शिक्षा पर अधिक से अधिक महत्व देना होगा।बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा अपनी मातृ भाषा मे ही करनी चाहिए जिससे उन्हें सीखने में आसानी हो सके। प्राचार्या डॉ इफ़्तिख़ार हसन ने उच्च शिक्षा के बारे में विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि अब किसी को बीच मे अगर पढ़ाई किसी कारणवश छोड़नी पड़ती है, तो उसे ड्रॉपआउट स्टूडेंट नही कहा जाएगा , उसे उतनी शिक्षा का ही प्रमाण पत्र मिलेगा।

गुरु नारायण ने स्किल डेवलपमेंट पर चर्चा करते हुए कहा कि नई शिक्षा नीति में कुछ नए विषय भी पढ़ने को मिलेंगे जैसे क्रिएटिविटी, इनोवेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, आर्गेनिक लिविंग, पर्यावरण शिक्षा आदि।
विद्याराम पाल ने कहा कि शिक्षा जॉब ओरिएंटेड, एंटरप्रेन्योर बनाने वाली होनी चाहिए, हमें प्री-प्राइमरी, अपर प्राइमरी से ही इस पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।मुख्य अतिथि ने कहा कि हमें छात्रों को मानसिक रूप से दृढ़ इच्छाशक्ति वाला बनाना होगा।
आज कोई ऐसा बालक, बालिका क्यों नहीं है जो पिता की आज्ञा पर 14 वर्ष के लिए वनवास चला जाए, हमें ऐसे ही बालकों, बालिकाओं के निर्माण करना है जो मानसिक रूप से तृप्त हों। उन्होंने बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने पर जोर दिया।अध्यक्षीय संबोधन में डॉ एमपी  शुक्ल ने भारत के गौरवशाली इतिहास के बारे में विचार व्यक्त किए, उन्होंने मौर्य साम्राज्य के बारे में बताया। आभार प्रदर्शन  वरिष्ठ आचार्य राजीव ने किया।

संवाद:- अरुण वाजपेयी