September 23, 2021

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याद न जाए बीते दिनों की !

ध्रुव गुप्त
डीवीएनए। आपको किसी ऐसे गायक का नाम लेने को कहा जाय जिसके गले में एक साथ प्रेम की असीमता, शरारतें, और व्यथा, वैराग्य की सादगी, अध्यात्म की ऊंचाई, प्रार्थना की कातरता, योग की रहस्यमयता, लोकगीतों का भोलापन, शास्त्रीयता की सहजता, कव्वाली का वैविध्य और गज़लों की गहराई सब कुछ समाहित हो जाय तो बेशक़ वह नाम मोहम्मद रफ़ी का होगा।

कुंदनलाल सहगल के बाद वे दूसरे शख्स थे जिन्होंने फिल्मी पार्श्वगायन का चेहरा और अंदाज़ दोनों बदला था। उनकी आवाज़ के रेंज और संभावनाओं को संगीतकार नौशाद और शंकर जयकिशन ने पहचाना, निखारा और शिखर दिया। रफ़ी की आवाज़ की ऊंचाई, गहराई, उमंग और दर्द के साथ हमारे देश की कई,-कई पीढियां किशोर, जवान और बूढ़ी हुईं हैं। इंसानी जज़्बों की उनकी जादुई, रूहानी अदायगी ने हमारी मुहब्बत को लफ्ज़ बख्शे, सपनों को पंख दिए, शरारतों को तेवर और व्यथा को बिस्तर अता की। सदा हंसते चेहरे वाली इस बेहद प्यारी शख्सियत के सुरों के साथ हम सबके जीवन का थोड़ा-थोड़ा हिस्सा ज़रूर जुड़ा हुआ है। हिंदी ही नहीं, भारतीय फिल्मों के इस सर्वकालीन महानतम गायक मोहम्मद रफ़ी को आज उनके जन्मदिन पर खिराज़-ए-अक़ीदत, उन्हीं के गाए एक गीत की पंक्तियों के साथ !
लोग मेरे ख़्वाबों को चुराके
डालेंगे अफ़सानों में
मेरे दिल की आग बंटेगी
दुनिया के परवानों में
वक़्त मेरे गीतों का खज़ाना ढूंढेगा
मुझको मेरे बाद ज़माना ढूंढेगा !
(लेखक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं)