April 21, 2021

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जामिया के सेंटर फॉर नॉर्थ ईस्ट स्टडीज एंड पॉलिसी रिसर्च में ऑनलाइन पैनल चर्चा का हुआ आयोजन

नई दिल्ली (डीवीएनए)। जामिया मिल्लिया इस्लामिया के सेंटर फॉर नॉर्थ ईस्ट स्टडीज एंड पॉलिसी रिसर्च ने ऑनलाइन पैनल चर्चा का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में भारत और विदेशों से बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया। केंद्र के आनरेरी निदेशक, प्रो एम अमरजीत सिंह ने इस कार्यक्रम की मुख्य अतिथि, विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो नजमा अख्तर, पैनल और प्रतिभागियों का स्वागत किया।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि प्रोफेसर नजमा अख्तर ने कहा कि केंद्र सरकार देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र में एक स्थायी शांति और आर्थिक विकास लाने की कोशिश कर रही है। इन प्रयासों के बावजूद, कुछ क्षेत्र संघर्ष-प्रभावित बने हुए हैं। ऐसी स्थिति में रहने के कारण, लोगों को भारी कठिनाइयों और कष्टों का सामना करना पड़ा है। उन्होंने कहा हालांकि, हिंसा की घटनाओं में पिछले कुछ वर्षों में काफी कमी आई है और यहां तक कि सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम, 1958 को हाल ही में त्रिपुरा, मेघालय और आंशिक रूप से अरुणाचल प्रदेश से हटा लिया गया है। लेकिन मणिपुर, नागालैंड और असम जैसे राज्यों में कुछ चिंताएं बनी हुई हैं।
प्रो अख्तर ने खुशी जाहिर की कि जामिया के नॉर्थ ईस्ट स्टडीज एंड पॉलिसी रिसर्च सेंटर को भारत सरकार के जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा उत्कृष्टता केंद्र के रूप में मान्यता दी गई है।
जामिया के समाजशास्त्र विभाग के प्रो प्रोफेसर सव्यसाची ने पैनल चर्चा का संचालन किया।
बीबीसी के पूर्व संवाददाता और नॉर्थ ईस्ट इंडिया का अध्ययन करके उस पर कई लेख लिखने वाले, श्री सुबीर भौमिक ने क्षेत्र में संघर्ष की स्थिति को एक “निरंतर प्रवृत्ति“ के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर भारत के संदर्भ में सरकार की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी‘, सिर्फ कनेक्टिविटी और वाणिज्य में सुधार करना ही नहीं बल्कि इस क्षेत्र में स्थायी शांति लाना है।
नागालैंड विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग की प्रोफेसर और नागा मदर्स एसोसिएशन की सलाहकार रोजमेरी दजुविचु ने नागा शांति प्रक्रिया की जटिलता के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में शांति प्रक्रिया को मामले दर मामले के आधार पर देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि नागा शांति प्रक्रिया “निश्चित रूप से केंद्र सरकार के दिमाग में“ है। उन्होंने यह भी कहा कि नागा लोगों को भी संघर्ष के जल्द समाधान का बेसब्री से इंतजार है। उन्होंने कहा कि शांति बहाली में महिलाओं को महत्वपूर्ण भूमिका दी जानी चाहिए।
‘इम्फाल रिव्यू एंड पाॅलिटिक्स‘ के संपादक और लेखक, श्री प्रदीप फंजौबम ने मातृभूमि और राज्य के विषय पर अपने विचार रखे। नॉर्थ ईस्ट क्षेत्र में मातृभूमि के दावों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि अक्सर यह जातीय समुदायों की मातृभूमि के दावों से ओवरलैप करता है।
फार इस्टर्न इकाॅनामिक रिव्यू के पूर्व संवाददाता, विश्लेषक और लेखक, श्री बर्टिल लिंटनर ने भारत के पूर्वोत्त्र में विद्रोही आंदोलनों के बदलते रुझान का दिलचस्प पहलू दिया। इस संदर्भ में उन्होंने बाहरी कारकों को भी रेखांकित किया। उनका कहना था कि क्षेत्र के तात्कालिक पड़ोसी देशों को ध्यान में रखे बिना पूर्वोत्तर में उग्रवाद को समझना और जांचना अधूरा होगा।
हैदराबाद विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख, प्रो खाम खान सुआन होसिंग ने पूर्वोत्तर भारत में कब, कैसे और किन परिस्थितियों में स्वायत्तता के जो तीन मौजूदा विचार उभरे हैं, उनका विशलेषन किया।