October 18, 2021

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कचरे से खिलौने बनाकर पढ़ते हैं गणित, 1000 से ज्यादा स्टूडेंटस को बनाया जीनियस

पटना (डीवीएनए)। बच्चों का खिलौनों से प्यार होना आम बात है। खिलौने बच्चों की आंखों में चमक भर देते हैं, ऐसे में हर माता-पिता कोशिश करते हैं कि वे अपने बच्चों को अच्छे-से-अच्छा खिलौना लाकर उनके बचपन में रंग भर सकें। हालांकि इच्छा रहने के बाद भी ग़रीबी के कारण कई परिवार अपने बच्चों को अच्छे खिलौने देने मेंअसमर्थ हैं।

लेकिन, बिहार के “आर के श्रीवास्तव” नाम के शख्स ने बच्चों की जिंदगी में पैसों की वजह से किसी खुशी की कमी न रह जाए, के लिए एक अलग तरह का काम किया है। साथ ही आर के श्रीवास्तव ने खिलौने के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों से आये बच्चों को गणित पढ़ाने का एक मजेदार औऱ नायाब तरीका ख़ोज निकाला है।

इसके लिए उन्होंने वेस्ट मटेरियल ( कबाड़ की जुगाड़) से खिलौने बनाने के तरीके खोजे और विकसित किए। बिहार के रोहतास जिले के बिक्रमगंज में जन्में आरके श्रीवास्तव बचपन में ही पिता के गुजरने के बाद और गरीबी के कारण चाहत रहने के बाबजूद देश के प्रसिद्ध शैक्षणिक संस्थानो के बजाय अपनी पढ़ाई गांव के सरकारी विद्यालयो से किया। उनकी प्रारंभिक, माध्यमिक , हाईस्कूल, कॉलेजो की पढाई भी पैसो के अभाव में सरकारी विद्यालय से हुई। उन्हें अपने शिक्षा के दौरान यह एहसास हो गया था कि देश में लाखों-करोड़ो प्रतिभायें होगे जो महंगी शिक्षा, महंगी किताबे इत्यादि के कारण अपने सपने को पूरा नहीं कर पा रहे होंगे।

टीबी की बिमारी के कारण आरके श्रीवास्तव आईआईटी प्रवेश परीक्षा नहीं दे पाये थे। टीबी की बिमारी के कारण आईआईटीयन न बनने की टिस ने उन्हें सैकङो गरीब स्टूडेंट्स को आईआईटीयन बनाने का सपना दिया, और आज वो इस काम में बख़ूबी लगे हुए हैं।

श्रीवास्तव कहते हैं कि टीबी की बिमारी के दौरान स्थानीय डाॅक्टर ने करीब 9 महीने दवा खाने का सलाह दिया। उस दौरान घर में अकेले बैठे-बैठे बोर होने लगा। फिर मन में विचार आया क्यों न आसपास के स्टूडेंट्स को बुलाकर गणित का गुर सिखाया जाये। वो कहते हैं कि बस यहीं से मेरे जीवन की नई पारी शुरू हो गई।

आगे बताते हैं कि पढ़ाने के दौरान मैंने महसूस किया कि बहुत सारे स्टूडेंट्स थे, जो प्रश्न को तो हल कर लेते थे परन्तु उनका काॅन्सेप्ट आजीवन क्लियर नहीं होता था। आजीवन शब्द का इस्तेमाल इसलिये किया गया कि यदि छात्र कुछ दिन उस चैप्टर की प्रैक्टिस छोङ दें, तो जल्द वे उसे भूल जाते थे। छात्रों की इन कमियों को दूर करने के लिए हमने स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सस्ती सामग्रियों का इस्तेमाल करके सिंपल खिलौने बना, बच्चों को समझाने के लिए शैक्षणिक प्रयोग किया, जिसका काफी सकारात्मक परिणाम दिखा।

इन खिलौनों के साथ श्रीवास्तव ने स्कूलों में सेमिनार के माध्यम से हज़ारों बच्चों को गणित के मूल सिद्धांतों को पढ़ाया, उनके इस मजेदार तरीके अर्थात कबाड़ की जुगाड़ से बने खिलौने के जरिए गणित पढ़ाने से बच्चे गणित के प्रति आकर्षित हुये और पढ़ने में अपनी रुचि दिखाने लगे।

श्रीवास्तव माचिस की तीलियों और साइकिल के वाल्व ट्यूब के छोटे-छोटे टुकड़ों से लेकर बेकार कागज का इस्तेमाल कर सुंदर खिलौने बनाने समेत, बच्चों के बीच ‘best-out-of-waste’ का आईडिया भी डाल रहे हैं। गणित के 3d Shape, ज्यमिती, क्षेत्रमिती, बीजगणित, त्रिकोणमिती सहित अनेकों कठिन-से-कठिन थ्योरम और प्रश्नों को खिलौनों के माध्यम से हल कर देते हैं। साथ ही इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि छात्र-छात्राएँ भी बड़ी आसानी से कॉन्सेप्ट को समझ प्रश्नों का हल कर देते हैं।

आज श्रीवास्तव छोटे ग्रामीण गांव के स्कूलों से लेकर देश के विभिन्न राज्यों के शैक्षणिक संस्थानों तक के हज़ारों बच्चों को खिलौने बनाकर गणित के प्रश्नों को हल करना सिखाया है। आर के श्रीवास्तव के शैक्षणिक कार्य शैली के चलते इनका नाम वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स लंदन, इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड, एशिया बुक ऑफ रिकॉर्डस में दर्ज हो चुका है। दर्जनो अवार्ड से भी सम्मानित हो चुके है।

श्रीवास्तव द्वारा बच्चों को कबाड़ की जुगाड़ से खिलौने बनाकर गणित सिखाना बच्चों के बीच गणित विषय को रूचिकर बना रहा है। आपको बताते चले की सिर्फ 1 रुपया गुरु दक्षिणा लेकर गणित पढाते है आर के श्रीवास्तव, सैकड़ों आर्थिक रूप से गरीब स्टूडेंट्स को आईआईटी,एनआईटी,बीसीईसीई सहित देश के प्रतिष्ठित संस्थानो के प्रवेश परीक्षाओ मे सफलता दिलाकर उनके सपनो को पंख लगा चुके हैं।
डिजिटल वार्ता ब्यूरो