September 29, 2021

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छोटे शहर के बड़े सपने, देश के इन फेमस चेहरों ने गरीबी से लड़कर बनाई अलग पहचान

नई दिल्ली (डीवीएनए)। कीचड़ में जन्म लेने वाला कमल भी कभी देवाशीष पायेगा, ऐसा नहीं सोचा था। आज बात कर रहे उन पाँच भारतीय प्रतिभा की जिन्होने यह साबित कर दिखाया कि जीतने वाले छोड़ते नहीं, छोड़ने वाले जीतते नहीं। अपने कड़ी मेहनत, उच्ची सोच, पक्का इरादा के बल पर लाखो युवाओ के रॉल मॉडल बन चुके हैं।

हम बात कर रहे भारत के उन 5 टैलेन्ट की, जिन्होंने छोटे शहर से निकलकर अपनी अलग पहचान बनायी। देश के टैलेन्ट हिमा दास, मैथिली ठाकुर, एमएस धोनी, शिक्षक आनंद कुमार, शिक्षक आरके श्रीवास्तव ने यह साबित कर दिखाया कि गरीबी अभिशाप नहीं, वरदान भी बन सकती है।

हिमा दास

हिमा दास (जन्म 09 जनवरी 2000) असम के ढिंग, नगाँव की रहने वाली एक भारतीय धावक हैं। वो आईएएएफ वर्ल्ड अंडर-20 एथलेटिक्स चैम्पियनशिप की 400 मीटर दौड़ स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं। हिमा ने 400 मीटर की दौड़ स्पर्धा में 51.46 सेकेंड का समय निकालकर स्वर्ण पदक जीता।

वर्ल्ड अंडर-20 चैंपियनशिप
स्वर्ण 2018 टेम्पेरे 400 मीटर
अप्रैल 2018 में गोल्ड कोस्ट में खेले गए कॉमनवेल्थ खेलों की 400 मीटर की स्पर्धा में हिमा दास ने 51.32 सेकेंड में दौर पूरी करते हुए छठवाँ स्थान प्राप्त किया था। तथा 4X400 मीटर स्पर्धा में उन्होंने सातवां स्थान प्राप्त किया था। हाल ही में गुवाहाटी में हुई अंतरराज्यीय चैंपियनशिप में उन्होंने गोल्ड मेडल अपने जीता था। इसके अलावा 18वें 2018 एशियाई खेल जकार्ता में हिमा दास ने दो दिन में दूसरी बार महिला 400 मीटर में राष्ट्रीय रिकार्ड तोड़कर रजत पदक जीता है।

2019 में हिमा ने पहला गोल्ड मेडल 2 जुलाई को ‘पोज़नान एथलेटिक्स ग्रांड प्रिक्स’ में 200 मीटर रेस में जीता था. इस रेस को उन्होंने 23.65 सेकंड में पूरा कर गोल्ड जीता था। 7 जुलाई 2019 को पोलैंड में ‘कुटनो एथलेटिक्स मीट’ के दौरान 200 मीटर रेस को हिमा ने 23.97 सेकंड में पूरा करके दूसरा गोल्ड मेडल हासिल किया था। 13 जुलाई 2019 को हिमा ने चेक रिपब्लिक में हुई ‘क्लांदो मेमोरियल एथलेटिक्स’ में महिलाओं की 200 मीटर रेस को 23.43 सेकेंड में पूरा कर फिर से तीसरा गोल्ड मेडल हासिल किया था। 19 साल की हिमा ने बुधवार 17 जुलाई 2019 को चेक रिपब्लिक में आयोजित ‘ताबोर एथलेटिक्स मीट’ के दौरान महिलाओं की 200 मीटर रेस को 23.25 सेकेंड में पूरा कर फिर से चौथा गोल्ड मेडल हासिल किया. इस दौरान हिमा अपने रिकॉर्ड (23.10 सेकंड) के बेहद करीब पहुंच गई थी लेकिन वो इसे तोड़ नहीं पाईं। हिमा ने चेक गणराज्य में ही शनिवार 20 जुलाई 2019 में 400 मीटर की स्पर्धा दौड़ में 52.09 सेकेंड के समय में जीत हासिल की. हिमा का जुलाई मास 2019 में मात्र 19 दिनों के भीतर प्राप्त किया गया यह पांचवां स्वर्ण पदक है.

चेक गणराज्य में आयोजित क्लाड्नो एथलेटिक्स में भाग लेने पहुंचीं हिमा दास ने 17 जुलाई 2019 को मुख्यमंत्री राहत कोष में राज्य में बाढ़ के लिए अपना आधा वेतन दान कर दिया। इसके अलावा उन्होंने ट्वीट कर बड़ी कंपनियों और व्यक्तियों से भी आगे आकर असम की मदद करने की अपील की।

मैथिली ठाकुर

मैथिली ठाकुर एक भारतीय गायिका हैं। वह 2017 में प्रसिद्धि के लिए बढ़ी जब उसने राइजिंग स्टार के सीज़न 1 में भाग लिया। मैथिली शो की पहली फाइनलिस्ट थी, उन्होंने ओम नमः शिवाय गाया, जिसने फाइनल में उनकी सीधे प्रवेश किया। वह दो वोटों से हारकर दूसरे स्थान पर रही। शो के बाद, उनकी इंटरनेट लोकप्रियता बढ़ गई। YouTube और Facebook पर उनके वीडियो अब 70,000 से 7 मिलियन के बीच मिलते हैं। वह मैथिली और भोजपुरी गाने गाती है जिसमें छठ गीत और कजरी शामिल हैं। वह अन्य राज्यों से कई तरह के बॉलीवुड कवर और अन्य पारंपरिक लोक संगीत भी गाती हैं।
मैथिली का जन्म 25 जुलाई 2000 को बिहार के मधुबनी जिले में स्थित बेनीपट्टी नामक एक छोटे से शहर में हुआ था। उनके पिता रमेश ठाकुर, जो खुद अपने क्षेत्र के लोकप्रिय संगीतकार थे, और माता भारती ठाकुर, एक गृहिणी। उसका नाम उसकी मां के नाम पर रखा गया था। उसके दो छोटे भाई हैं, जिनका नाम रिशव और अयाची है, जो उनकी बड़ी बहन की संगीत यात्रा का अनुसरण करते हैं, जो तबला बजाकर और गायन में उनका साथ देते हैं। उसने अपने पिता से संगीत सीखा। अपनी बेटी की क्षमता को महसूस करते हुए और अधिक अवसर प्राप्त करने के लिए, रमेश ठाकुर ने खुद को और अपने परिवार को द्वारका नियर नई दिल्ली में स्थित किया। मैथिली और उनके दो भाइयों की शिक्षा वहाँ के बाल भवन इंटरनेशनल स्कूल में हुई थी। यहां तक ​​कि उनकी पढ़ाई के दौरान, तीन भाई-बहनों को उनके पिता ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत, हारमोनियम और तबला (रिशव के मामले में) में प्रशिक्षित किया था।
मैथिली की संगीत यात्रा 2011 में शुरू हुई, जब वह ज़ी टीवी में प्रसारित होने वाले लिटिल चैंप्स नामक एक रियलिटी शो में दिखाई दी। हालाँकि वह पहले भी कई स्थानीय कार्यक्रमों में दिखाई दी थीं, लेकिन इस रियलिटी शो के माध्यम से उन्हें पहचान मिली। चार साल बाद, उन्होंने एक और रियलिटी शो, इंडियन आइडल जूनियर, सोनी टीवी में प्रसारित किया। लेकिन वह रियलिटी शो राइजिंग स्टार के माध्यम से एक राष्ट्रीय सनसनी बन गई, जिसमें वह रनर-अप के रूप में समाप्त हुई। शो के शुरुआती दौर से ही, मैथिली में अधिक लोकप्रियता थी, जिसने आसानी से चुनौतीपूर्ण गाने भी गाए थे।

वह अपने दो छोटे भाइयों रिशव और अयाची के साथ देखी जाती है। रिशव तबले पर हैं और अयाची एक गायक हैं। 2019 में मैथिली और उनके दो भाइयों को चुनाव आयोग द्वारा मधुबनी का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया। उन्होंने 2015 में एक भारतीय संगीत शो “आई जीनियस यंग सिंगिंग स्टार” जीता और उन्होंने एक एल्बम हां रब्बा (यूनिवर्सल म्यूजिक) भी लॉन्च किया। उनके फेसबुक चैनल के 2 मिलियन से अधिक फॉलोअर हैं और इंस्टाग्राम पर उनके 700,000 से अधिक अनुयायी हैं।

महेंद्र सिंह धोनी
महेंद्र सिंह धोनी अथवा मानद लेफ्टिनेंट कर्नल महेंद्र सिंह धोनी (एम एस धोनी भी) झारखंड, रांची के एक राजपूत परिवार में जन्मे पद्म भूषण, पद्म श्री और राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित क्रिकेट खिलाड़ी हैं। वे भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और भारत के सबसे सफल एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कप्तान रह चुके हैं। शुरुआत में एक असाधारण उज्जवल व आक्रामक बल्लेबाज़ के नाम पर जाने गए। धोनी भारतीय एक दिवसीय के सबसे शांतचित्त कप्तानों में से जाने जाते हैं। उनकी कप्तानी में भारत ने २००७ आईसीसी विश्व ट्वेन्टी २०, 2007–08 कॉमनवेल्थ बैंक सीरीज , २०११ क्रिकेट विश्व कप, आइसीसी चैम्पियंस ट्रॉफ़ी २०१३ और बॉर्डर-गावस्कर ट्राफी जीती जिसमें भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 4-0 से हराया। उन्होंने भारतीय टीम को श्रीलंका और न्यूजीलैंड में पहली अतिरिक्त वनडे सीरीज़ जीत दिलाई। ०२ सितम्बर २०१४ को उन्होंने भारत को २४ साल बाद इंग्लैंड में वनडे सीरीज में जीत दिलाई।

आनन्द कुमार
आनन्द कुमार (जन्म 1 जनवरी 1973) एक भारतीय गणितज्ञ, शिक्षाविद तथा बहुत सी राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय गणित की पत्रिकाओं के स्तम्भकार हैं। उन्हें प्रसिद्धि सुपर 30 कार्यक्रम के कारण मिली, जो कि उन्होंने पटना, बिहार से 2002 में प्रारम्भ किया था, जिसके अन्तर्गत आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों को आईआईटी संयुक्त प्रवेश परीक्षा की तैयारी करवाया जाता है। 2018 के आँकड़ों के अनुसार, उनके द्वारा प्रशिक्षित 480 में 422 छात्र भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के लिये चयनित हो चुके हैं। डिस्कवरी चैनल ने भी इनके कार्यों पर लघु फ़िल्म बनाई है।उन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका के मैसच्युसेट्स प्रौद्योगिकी संस्थान तथा हार्वर्ड विश्वविद्यालय द्वारा उनके कार्यों पर बोलने के लिये
निमंत्रण मिला। आनंद कुमार अपने सफ़लता का श्रेय अपने माॅ जयंती देवी को देते है।

आरके श्रीवास्तव
जब बचपन अभावग्रस्त हो, इतनी कि पढ़ाई के लिये शुल्क कम लगे इसलिये निजी संस्थान की जगह सरकारी संस्थान में पढ़ाई करने की मजबूरी रहती थी।
जब अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई की तिलांजलि दे कर मातृ भाषा मे अंतरराष्ट्रीय मानकों से लड़ने को कहा जाता था तब वह मजबूरी और सालती थी।
जब किताबों के पैसे न हो, और पुरानी आधे कीमत वाले भी खरीदने के लिये सोचनी पड़ती थी तब उनके सपने बेमानी हो जाते थे।
जब बचपन त्रासदी की भेंट चढ़ जाय, और आगे पीछे कोई प्रोत्साहित करने वाला कोई न हो तो जो जैसे हो रहा है, होने देने की मजबूरी पलती थी।
बिजली के अभाव में कैरोसिन तेल की बदबूदार अंगारों के रोशनी में पढ़ने की मजबूरी हो तो खाली पेट और गले की प्यास भी बेमानी होती थी।

किसी ने क्या खूब कहा कि- खुलकर सपने देखिए, जब तक आप सपने नहीं देखेंगे वो पूरे कैसे होंगे। सपने देखने का हक हर किसी का है
चाहे वह गरीब हो या अमीर, इंग्लिश मीडियम से हो या फिर हिंदी मीडियम से ,आज हम आपको एक ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी बता रहे हैं, जिसे जानने के बाद आपके अंदर भी कुछ कर दिखाने का जज्बा पैदा होगा।

ये स्टोरी है चर्चित मैथेमैटिक्स गुरू फेम बिहार के आरके श्रीवास्तव की, जो सिर्फ 1 रूपया गुरू दक्षिणा लेकर सैकङो गरीबों को आईआईटी,एनआईटी, बीसीईसीई सहित देश के प्रतिष्ठित संस्थानो मे दाखिला दिलाकर उनके सपने को पंख लगा चुके है।

एक वक्त था जब हिंदी मीडियम के बच्चे खुद को अंग्रेजी मीडियम के बच्चों के आगे कमजोर मानते थे, लेकिन अब ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। बस आपको खुद पर भरोसा होना चाहिए। आरके श्रीवास्तव को खुद पर और खुद की मेहनत पर पूरा भरोसा था. मेहनत और संघर्ष के आगे वह कभी कोताही नहीं बरतते थे

आरके श्रीवास्तव ने अपनी पढ़ाई हिंदी मीडियम से किया था, कभी स्कूल के दिनों में टाट-पट्टी पर बैठकर पढ़ने वाला लड़का आज उस मुकाम पर है जहां होने का सपना हर कोई देखता है. हालांकि, आरके श्रीवास्तव को यहां तक पहुंचने में कई कठिनाईओं का सामना करना पड़ा, लेकिन मेहनत के आगे नामुमकिन कुछ भी नहीं,

बिहार के रोहतास जिले के एक छोटे से गांव बिक्रमगंज में पले पढ़े आरके श्रीवास्तव स्कूल के दिनों में कभी जमीन पर बैठकर पढ़ाई किया करते थे, बचपन में 5 वर्ष के उम्र में पिताजी पारस नाथ लाल के गुजरने के बाद माँ आरती देवी ने काफी संघर्ष कर पढाया । आरके श्रीवास्तव अपने सफ़लता का श्रेय माँ के संघर्षों को देते है। आज माँ अपने बेटे की उपलब्धियो पर गर्व करती है।

आज वह देश के चर्चित हस्तियाँ में शुमार है। देश के टॉप 10 शिक्षको में आरके श्रीवास्तव का नाम आ चूका है। वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्डस में भी दर्ज हो चूका है नाम, उनके शैक्षणिक कार्यशैली को महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोबिंद भी कर चुके है सराहना, आरके श्रीवास्तव बताते है की उनके यहाँ जब गांव में लाइट चली जाती थी, तो कुछ वर्षो तक ढिबरी की रोशनी में उसके बाद कई वर्षो तक लालटेन की रोशनी में पढ़ाई करना पड़ा.

कभी भी अभावों को पढ़ाई के बीच नहीं आने दिया. हर मुश्किलों का डटकर सामना किया

स्कूल की पढ़ाई के बाद जब कॉलेज गये, तो खुद को थोड़ा कमजोर समझने लगे, वजह थी अंग्रेजी बोलना. मैं स्कूल के दिनों में सबसे आगे बैठा करता था , और कॉलेज में अंग्रेजी के कारण सबसे पीछे, हालांकि, ये भी कुछ दिनों का था, मैं डरा नहीं बल्कि मेहनत किया और सफ़लता मिलते गया.

एक वक्त ऐसा आया जब मैं टीवी की बीमारी से ग्रस्त हो गया, मै आईआईटी प्रवेश परीक्षा नही दे पाया उस समय ऐसा लगा जैसे मेरे आईआईटीयन न बनना मेरे सपने टुट गये, डॉक्टर की सलाह से घर आकर 1 वर्ष तक दवा खाया और रेस्ट किया । घर पर काफी बोर होने लगा ,इसी दौरान घर बुलाकर अगल बगल के स्टूडेंट्स को निःशुल्क शिक्षा देने लगा। लेकिन इसके बावजूद पढ़ाई करता, मैंने कभी हार नहीं माना, पढ़ाई भी करते रहता. और आज आरके श्रीवास्तव सारी मुश्किलों को पार करके एक ब्रांड बन चुके है।

आपको बताते चले की बिहार के रोहतास जिले के बिक्रमगंज निवासी मैथेमैटिक्स गुरू फेम आरके श्रीवास्तव आज पहचान के मोहताज नहीं। उनके शैक्षणिक कार्यशैली के तहत गणित पढाने के तरीके का कायल है पूरी दुनिया। कबाड़ की जुगाड़ से प्रैक्टिकल कर गणित सिखाना और चुटकुले सुनाकर खेल-खेल में पूरी रात लगातार 12 घंटे गणित पढाना किसी चमत्कार से कम नहीं। बिहारी गुरू आरके श्रीवास्तव का नाम वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्डस लंदन सहित कई रिकॉर्ड्स बुक मे भी दर्ज है। दर्जनो अवार्ड से अब तक हो चुके हैं सम्मानित।

आरके श्रीवास्तव के शैक्षणिक कार्यशैली के तहत बढती लोकप्रियता ने बढ़ाया बिहार का मान सम्मान। अपने कड़ी मेहनत, उच्ची सोच, पक्का इरादा के बल पर बन चुके हैं लाखो युवायो के रॉल मॉडल। देश के महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी आर के श्रीवास्तव के शैक्षणिक कार्यशैली की प्रशंसा कर चुके है। शैक्षणिक मीटिंग के दौरान मैथेमैटिक्स गुरू के नाम से महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी कर चुके है सम्बोधित। आरके श्रीवास्तव ने युवाओ को हमेशा बताया कि “जीतने वाले छोड़ते नहीं, और छोड़ने वाले जीतते नहीं” के मार्ग पर हमेशा आगे बढ़े। आपको सफलता पाना है तो कई असफलता के बाद भी अपने लक्ष्य को छोड़े नहीं, उसे पाने के लिये निरंतर परिश्रम करते रहे, आपको एक दिन सफलता जरुर मिलेगी। देश के विभिन्न राज्यो के शैक्षणिक एवं समाजिक कार्यक्रमों में अपने सम्बोधन से बिहार के मान सम्मान को हमेशा आगे बढ़ाया है इस बिहारी गुरू ने।

दर्जनों अवार्ड से सम्मानित हो चुके बिहार के अनमोल रत्न है आर के श्रीवास्तव । शिक्षण कार्य के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में नि:स्वार्थ योगदान वाले ऐसे सारे गुरुओ को पुरा देश सलाम करता है। आपको बताते चले कि बिहार आदिकाल से ही महापुरुषो की भूमि रही है, जिन्होंने हिंदुस्तान सहित पूरे विश्व को मार्ग दिखाया।

कबाड़ के खिलौनों से कुछ यूं पढ़ाते ये मैथ गुरु, गणित से बिदकने वाले बच्चे भी बन रहे इंजीनियर

कबाड़ के खिलौनों से कुछ यूं पढ़ाते ये मैथ गुरु, गणित से बिदकने वाले बच्चे भी बन रहे इंजीनियर
बिहार के बिक्रमगंज में रहने वाले शिक्षक आरके श्रीवास्तव का वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज है नाम,

कबाड़ से खिलौने बना उनके माध्‍यम से गणित पढ़ाने की अनोखी पद्धति अपनाई है। बच्‍चे उनके इस अंदाज के कायल हैं। आइए जानते हैं उनके बार में।…

कबाड़ (Garbage) से कागज या कूट के टुकड़े लिए। उससे वृत्त (Circle) बनाया और उसे चार भागों में बांटकर त्रिभुज (Trangle) की परिभाषा समझा दी। गणित (Mathematics) के उलझे सवालों को कुछ ऐसे ही चुटकियों में सुलझाने वाले रजनीकांत श्रीवास्तव की पहचान आज ‘मैथ गुरु’ (Math Guru) के रूप में बन चुकी है। कबाड़ से बनाए गए खिलौनों (Toys from Garbage) के जरिए समझाने का अंदाज इतना अनोखा है कि गणित से बिदकने वाले बच्चे भी लिख-पढ़कर इंजीनियर (Engineer) बन गए।

रोहतास जिला के बिक्रमगंज में रजनीकांत का आशियाना है। उसी दायरे से गरीब विद्यार्थियों के लिए उम्मीद की एक किरण निकलती है। कभी रजनीकांत को खुद के लिए ऐसे ही किसी गुरु की तलाश थी, लेकिन बदकिस्मती से उनकी उम्मीद पूरी नहीं हुई। घर की तंगहाली के बीच वे तपेदिक (Tuberculosis) के ऐसे मरीज बन गए कि आइआइटी की प्रवेश परीक्षा (IIT Entrance Examination) तक नहीं दे पाए।
इंजीनियर नहीं बने तो आया गरीबों को बढ़ाने का विचार

इंजीनियर बनने की अधूरी हरसत कलेजे में टीस बन गई और उसी के साथ गरीबी के कारण मजबूर बच्चों को आगे बढ़ाने का विचार आया। माध्यम बना गणित, लेकिन कमाई का ख्याल तक नहीं। बच्चों की जिद है, लिहाजा पारिश्रमिक के रूप में प्रति माह एक रुपया लेते हैं। यह गुरु-दक्षिणा सांकेतिक है।

रामानुजम व वशिष्ठ नारायण सिंह को मानते आदर्श

प्रसिद्ध गणितज्ञ रामानुजम (Ramanujam) और वशिष्ठ नारायण सिंह (Vashishtha Narayan Singh) को अपना आदर्श मानने वाले रजनीकांत श्रीवास्तव कहते हैं कि अपने जैसे उन बच्चों को पढ़ा-लिखा कर काफी संतुष्टि मिलती है, जो मार्गदर्शन नहीं मिलने से प्राय: पिछड़ जाते हैं। कहते हैं, ”मैं रास्ता बताने वाला हूं, गुरु नहीं। यह तो बच्‍चों का प्रेम है, जो मेरा इतना सम्मान करते हैं।”

निकाला कबाड़ के खिलौनों से पढ़ाने का लाजवाब तरीका

गणितीय चुटकुले (Mathematical Jokes) सुनाकर रजनीकांत बच्चों को सवालों के सूत्र (Mathematical Formula) में बांध लेते हैं। उसके साथ ही कबाड़ से बनाए गए खिलौनों के माध्यम से पाठ (Lesson) को उनके दिमाग (Brain) में उतार देते हैं। दरअसल, संसाधनों की कमी से कबाड़ उनके लिए विकल्प बन गया। ट्यूबलाइट, माचिस की तीली, साइकिल के ट्यूब और कागज आदि से खिलौनानुमा आकृति तैयार कर वे गणित के जटिल सवालों के हल निकालते हैं। लघुत्तम समापवर्त्य (Lowest Common Multiple) और महत्‍तम समापवर्त्य (Highest Common Factor) , रोमन अंक (Roman Number) , कैलकुलस , कोऑडिनेट, ट्रिगौनोमेट्री, अल्जेब्रा आदि के कॉन्‍सेप्ट को खिलौनों से समझाने का उनका तरीका अद्भुत (Unique) है। वे कहते हैं, ”खिलौने बच्चों की आंखों में चमक भर देते हैं, फिर उनका दिमाग पाठ को लपक लेता है।”

रजनीकांत ( आरके श्रीवास्तव) गणित के रुचिकर विषय मानते हैं। कहते हैं कि इसे बेवजह हौवा बना दिया गया है। जरूरत है इसके प्रति विद्यार्थियों की दिलचस्पी जगाने की। अगर किसी फॉर्मूला से आप सवाल को हल कर रहे हैं तो उसके पीछे छुपे तथ्यों को जानिए। वह फॉर्मूला क्यों बना और आप अपने सहज-सरल तरीके से कैसे उस सवाल को हल कर सकते हैं, यह जानना जरुरी है