May 12, 2021

DVNA

Digital Varta News Agency

जिस पेड़ ने छाया दी उसे ही क्यों दुतकारते हो?

मुहम्मद फैज़ान
जिन लबों पर कभी खुशियां हुआ करती थीं, उन पर आज गिले-शिक्वे हैं। उम्र के आखिरी पड़ाव पर उम्मीदें टूट चुकी हैं। पूरी जिंदगी अपने बच्चों पर न्यौछावर कर दी, आज वही उन्हें बोझ समझने लगे हैं। जिन्हें हाथ थाम कर चलना सिखाया, उन्हें अब साथ चलते हुए भी शर्म महसूस होती है।

यह कहानी किसी एक की नहीं बल्कि उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके उस हर मां-बाप की है। जो अपने ही परिवार द्वारा उपेक्षित किए जा रहे हैं। आज भी उन आंखों में आशा की किरण है, लेकिन अब तो आंखों की रोशनी भी कम हो चुकी है फिर सपने कैसे। एक-एक दिन गिन-गिन कर काट रहे हैं। इंतजार है, शायद मौत का।
जिन बच्चों की छोटी सी जिद पर अपनी कमाई सारी उम्र लुटाई, आज वही उनकी दवा के लिए भी अपने खाली हाथ दिखाते हैं। सुबह से शाम तक उनकी आंसूओं से भरी निगाहें किसे खोजती हैं? सब उम्मीदें तो पहले ही दम तोड़ चुकी हैं।

वृद्धाश्रमों में बुजुर्गों की तेजी से बढ़ती संख्या इस बात का साफ सबूत है कि वृद्धों को उपेक्षित किया जा रहा है। हमें समझना होगा कि अगर समाज के इस अनुभवी स्तंभ को यूं ही नज़रअंदाज किया जाता रहा तो हम उस अनुभव से भी कोसो दूर हो जाएंगे, जो इनके पास है।

सबसे बड़ी बात तो ये है कि वृद्ध तो एक दिन हम सभी होंगे और तब हमारे साथ क्या होगा। क्या हमें भी वृद्धाश्रम में धकेल दिया जाएगा। आने वाली पीढ़ी तो हमसे भी चार कदम आगे रहनी है। यदि आज हमने अपने बच्चों और स्वयं अपने भीतर वृद्धों का सम्मान करने का संस्कार नहीं पैदा किया तो कल वाकई हमारे लिए बेहद भयावह होगा।

डिजिटल वार्ता/सम्पादकीय