June 17, 2021

DVNA

Digital Varta News Agency

उधार की किताबो से की पढ़ाई, अब मैथेमैटिक्स गुरू बन सैकड़ों गरीब परिवार के सपने को लगा दिया पंख

पटना। डीवीएनए

बिहार के रोहतास जिले के राजपुर ( जमोढी ) गांव में रहते थे आरके श्रीवास्तव के पिता पारस नाथ लाल। गांव में खेती कर पेट पालते थे, लेकिन जब सात बच्चे हो गए तो कमाई कम पड़ने लगी । तो वे खेती के साथ बिक्रमगंज शहर आकर प्रिंटिंग प्रेस चलाने लगे ताकी परिवार का भरण पोषण ठीक से हो सके। दिन रात परिश्रम करने लगे, जिससे ज्यादा पैसा सामुहिक परिवार चलाने के लिये मिल सके। लेकिन कुछ साल बाद वे इतने बीमार रहने लगे जिससे काम करना मुश्किल हो गया। वे चौबीसों घंटे खेती के साथ साथ प्रेस मे काम करते थे और खेती के दौरान चुभी काटी और शुगर की बिमारी से हुआ वह घाव कुछ महीनो मे एक बड़ा रूप ले लिया। आरके श्रीवास्तव के पिता पारस नाथ लाल के बड़े भाई कोलकाता मे रह्ते थे तो वे ईलाज के लिये उन्हे कोलकता बुला लिया , परंतु डॉक्टर ने बोला की घाव आगे न बढ़े इसके लिये इनका एक पैर काटना पडेगा। ऑपरेशन के कुछ घंटे बाद ही होश मे आने के बाद वे इस दुनिया को छोड चले गये। अब आरके श्रीवास्तव के बड़े भाई शिवकुमार श्रीवास्तव पर परिवार चलाने की जिम्मेवारी सिर्फ 15 वर्ष के उम्र मे ही आ गया। छोटे भाई रजनी कान्त श्रीवास्तव ( आरके श्रीवास्तव) जिन्हे वह प्यार से सोनू बुलाते थे , की पढ़ाई लिखाई की जिम्मेवारी सहित परिवार का भरण पोषण कैसे हो इसकी चिंता उन्हे सताने लगा। पिता के गम मे डूबने के कई दिनो बाद उन्होने कुछ पैसे उधार लेकर एक आटो रिक्शा खरीदा। आटो रिक्शा के प्रतिदिन के 100 से 200 रुपये के इनकम से छोटे भाई की पढ़ाई और परिवार का भरण पोषण होने लगा।

मां आरती देवी और बड़े भाई शिवकुमार श्रीवास्तव की बड़ी इच्छा थी कि आरके श्रीवास्तव किसी तरह पढ़-लिख जाएं। माँ खुद कभी स्कूल नहीं गईं, लेकिन अपने बच्चे को सुबह स्कूल भेजने में कोई कोताही नहीं करती थी। गांव के उस सरकारी स्कूल में पढ़ाई अच्छी नहीं होती थी, लेकिन दूसरा विकल्प भी नहीं था। आरके श्रीवास्तव जब 1 क्लास में थे जब पिता इस दुनिया को छोड चले गये। बड़े भाई शिवकुमार श्रीवास्तव के अथक परिश्रम के साथ समय धीरे धीरे बीतते गया और रजनी कान्त श्रीवास्तव ( आरके श्रीवास्तव) पढ़ाई मे खूब मेहनत करते। कभी इतने पैसे नहीं मिले कि नई किताबें खरीद सके। किसी से पुरानी किताबें उधार लेकर किसी तरह वह अपना काम चलाते थे। आटो रिक्शा जिस दिन खराब हो जाता, उस दिन परिवार को भूखे पेटसोने की मजबूरी होती थी।
बच्चों को भूखा देख माँ आरती देवी की आत्मा कराह उठती, लेकिन उनके हाथ में कुछ नहीं था। वे बच्चों को समझातीं कि इस गरीबी से निकलने का एक ही जरिया है, पढ़ाईऔर सिर्फ पढाई । रजनी कान्त श्रीवास्तव( आरके श्रीवास्तव) को उनकी बात बचपन में ही समझ आ गई । जब वह दसवीं में पहुंचे तो पहले से और मेहनत करने लगे। फिर वह अच्छे अंकों से दसवीं पास हो गये और अब आगे पढ़ाई की चुनौती थी। इसी दौरान आरके श्रीवास्तव अब खुद अपने से नीचे क्लास के स्टूडेंट्स को पढाना शुरु किया, जिससे जो पैसे उन्हे मिलते उससे उनके आगे के पढ़ाई का खर्च निकलते गया। उन्होंने अपनी शिक्षा के उपरांत गणित में अपनी गहरी रुचि विकसित की। आरके श्रीवास्तव अपने पढ़ाई के दौरान टीबी की बीमारी के चलते नही दे पाये थे आईआईटी प्रवेश परीक्षा . उनकी इसी टिस ने बना दिया सैकड़ो स्टूडेंट्स को इंजीनयर ,आर्थिक रूप से गरीब परिवार में जन्मे आरके श्रीवास्तव का जीवन भी काफी संघर्ष भरा रहा । जब आरके श्रीवास्तव बड़े हुए तो फिर उनपर दुखो का पहाड़ टूट गया, पिता की फर्ज निभाने वाले एकलौते बड़े भाई शिवकुमार श्रीवास्तव भी इस दुनिया को छोड़ कर चले गए। अब इसी उम्र में आरके श्रीवास्तव पर अपने तीन भतीजियों की शादी और भतीजे को पढ़ाने लिखाने सहित सारे परिवार की जिम्मेदारी आ गयी।

छोटी उम्र में इतना संघर्ष झेल चुके आरके श्रीवास्तव की आंखें उस समय अपनी भावनाओं को संभाल नहीं पाती जब कोई उनका पढाया गरीब स्टूडेंट्स इंजीनियर बन अपने सपने को पंख लगाता है । आरके श्रीवास्तव बताते है की जब भी मेरे पढाये गरीब स्टूडेंट्स सफल होता है तो मैंने गौर से अपने उन दिनो को देखता हु तो आज भी वही पैंट-शर्ट याद आता हो वही एक जोड़ी कपड़े पहनकर पूरे दो वर्ष 11वी, 12 वी की पढ़ाई करने जाता था। और बीते दो साल इसी के साथ गुजारे ।निरक्षर माता के बेटे आरके श्रीवास्तव ने केवल कामयाबी हासिल नहीं की, बल्कि वह आज लाखो युवायो का रॉल मॉडल बन चुके है ।अपने पिता और बड़े भाई ( जो आज इस दुनिया मे नही है) के सपने को साकार करते हुए सैकङो गरीब स्टूडेंट्स के लिए मसीहा बन चुके है । आज आपनी मां की प्रेरणा और अपनी मेहनत के बूते वह वीरकुवर सिंह विश्वविद्यालय से पढाई पूरी कर देश के विभिन्न राज्यो के प्रतिस्ठित शैक्षणिक संस्थाओ से जुड़कर सैकङो सपने को अपने ज्ञान से साकार कर रहे। आज माँ आरती देवी कहती है की बेटे आरके श्रीवास्तव के साथ निरंतर जुड रही उपलब्धियो मे उसके पिता और बड़े भाई साथ रह्ते तो खुशी का ठिकाना नही रह्ता। परंतु आरके श्रीवास्तव कहते है की माँ और भाभी का आशीर्वाद तो मेरे साथ है ही प्रतिदिन इनसे हमेशा समाज सेवा सीखते रह्ता हु लेकिन पापा और भैया का आशीर्वाद और दिखाया रास्ता मुझे सही दिशा मे मेहनत करने के लिये प्रेरित करता है । आपको बताते चले की आरके श्रीवास्तव के शैक्षणिक कार्य शैली की प्रशंसा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी कर चुके है । दर्जनो अवार्ड से भी सम्मानित आरके श्रीवास्तव का नाम वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड लंदन, गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड मे भी दर्ज है । जादूई तरीके से गणित पढाने के लिये मशहूर है । सैकङो गरीब स्टूडेंट्स को इंजीनियर बना चुके है मैथेमैटिक्स गुरू आर के श्रीवास्तव। सिर्फ 1 रू गुरू दक्षिणा लेकर सैकङो गरीबों को आईआईटी,एनआईटी,बीसीईसीई प्रवेश परीक्षा में सफलता दिलाकर उनके सपने को लगा चुके है पंख। zee news ( जी न्यूज़) पर भी बिहारी गुरु के शैक्षणिक कार्यशैली और रिकॉर्ड्स की स्टोरी दिखाया जा चुका है । देश के सारे प्रतिष्ठित अखबारो मे सैकङो से अधिक बार आरके श्रीवास्तव के शैक्षणिक कार्य शैली की खबरे छप चुका है ।