कैनेडी के बाद अब आबे को भी याद रखेगा भारत

 
R K Sinha

आर.के. सिन्हा

भारत के परम मित्र और हितैषी जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की जापान के एक छोटे से शहर में रेलवे स्टेशन के बाहर लगभग सौ लोगों की एक छोटी सी सभा को संबोधित करते हुए 8 जुलाई को गोली मारकर हत्या की दिल दहलाने वाली घटना ने अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एक. कैनेडी की 22 नवंबर,1963 को डलास हुई में हत्या की यादें ताजा कर दी हैं। कैनेडी की तरह भारत अब शिंजो आबे को भी सदैव अपने एक सच्चे मित्र के रूप में याद रखेगा। अजीब इत्तिफाक है कि भारत को चाहने वाले दो देशों के शिखर नेताओं का अंत इतने भयावह रूप में हुआ। निश्चित रूप से शिंजो आबे के आकस्मिक निधन से भारत-जापान संबंधों का एक मजबूत स्तंभ गिर गया है। वे जापान के प्रधानमंत्री के रूप में चार बार भारत आए। उन्हें भारत ने भी दिल खोलकर प्रेम-सम्मान दिया। जिस विरासत को सहेजकर रखने की जिम्मेदारी आबे को मिली थी, आबे ने उसे और मजबूत किया। वाराणसी के घाटों पर गंगा आरती में शरीक होना हो या बुलेट ट्रेन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारत के भविष्य की झलक दिखाना, आबे वह चेहरा रहे हैं, जिसमें भारतीयों को उम्मीद नजर आती थी। वह उन दुर्लभ नेताओं में से एक थे जिन्हों ने न सिर्फ जापान को आर्थिक महाशक्ति बनाया, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र की चुनौतियों से भी कुशलतापूर्वक निपटे।

अब बुजुर्ग हो रहे हिन्दुस्तानियों को याद होगा कि 1962 के युद्ध के वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने भी खुलकर भारत का साथ दिया था। उनका भी सारा विश्व सम्मान करता था। पंडित नेहरु के आग्रह पर ही सही पर उन्होंने चीन को तब साफ और खुले शब्दों में समझा दिया था कि यदि उसने युद्ध विराम नहीं किया तो अमेरिका भी युद्ध में कूद पड़ेगा। उसके बाद चीन ने 20 नवम्बर 1962 को युद्ध विराम किया था और साथ ही विवादित क्षेत्र से अपनी वापसी की घोषणा भी की थी। तब कहीं जाकर युद्ध खत्म हो गया था।  यह  भी याद रखा जाए कि उस युद्ध के दौरान  भारत में अमेरिका के राजदूत जॉन के. गेलब्रिथ भारत सरकार को सलाह दे रहे थे कि उसकी समर नीति किस तरह की रहे। कैनेडी और गेलब्रिथ परम मित्र थे।

अगर शिंजो आबे बार-बार भारत आते रहे, तो कैनेडी राष्ट्रपति के रूप में एक बार भी भारत नहीं आए। कैनेडी को 1964 के शुरू में भारत की सरकारी यात्रा पर आना था।  तब उनका राजधानी में 1990 के अंत में पूरी तरह से  अमेरिकी एंबेसी बिल्डिंग को देखने का कार्यक्रम तय था। बीसवीं सदी के महानतम आर्किटेक्ट माने जाने वाले फ्रेंक लायड राइट कहते थे कि स्थापत्य की दृष्टि से  अमेरिकी एंबेसी  भवन अद्वितीय है I

जाहिर है, राइट की टिप्पणी के बाद कैनेडी को पता चल ही गया था कि नई दिल्ली में बनी अमेरिकी एंबेसी बिल्डिंग अमेरिकी आर्किटेक्ट एडवर्ड डुरेल स्टोन की रचनाधर्मिता का चरम है। सच में 27 एकड़ में बनी अमेरिकी एंबेसी अपने आप में उत्कृष्ट है। कैनेडी  इसे देखकर प्रसन्न अवश्य होते। पर अफसोस कि कैनेडी की डलास में हत्या कर दी जाती है। उनकी अकाल मृत्यु से दुनिया स्तब्ध हो गई। इस तरह वे राष्ट्पति पद पर रहते हुए तो भारत नहीं आ सके। वैसे वे 1955 में भारत घुमने के लिए जरूर आए थे। पर श्रीमती जैक्लीन कैनेडी 12-21 मार्च,1962 को भारत यात्रा पर आईं थीं। उनकी उस यात्रा की सारी तैयारी  जॉन कैनिथ गेलब्रिथ देख रहे थे।

जापान के प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल में ही शिंजो आबे ने भारत का दौरा किया। उस वक्ता यूपीए की सरकार थी और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री। 22 अगस्त। 2006 को भारतीय संसद में उनका संबोधन 'दो समुद्रों के मिलन' के रूप में जाना जाता है। इसी भाषण में आबे ने मुक्तम और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र की वकालत की थी। अगले कुछ दिनों में, जापान ने पूर्वोत्तर भारत में निवेश शुरू कर दिया। ऐसा करने वाला जापान पहला देश था। आबे समझ रहे थे कि चीन की विकराल चुनौती से निपटने के लिए उन्हें  भारत से अच्छा साझेदार नहीं मिलेगा। कहना न होगा कि आज की विश्व कूटनीति में आबे की दूरदर्शिता को देखा जा सकता है। कैनेडी की तरह वे भी तब भारत आए थे जब वे नौजवान थे। यानी भारत के साथ आबे का रिश्ता  केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहा। वह अपने नाना के प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए भारत आए थे और तब ही से उनका भारत से घनिष्ठ संबंध बन गया था। इसी रिश्ते के लिए और शिंजो आबे के सम्मान में भारत ने 9 जुलाई को राष्ट्रीय शोक मनाया था।

शिंजो आबे सन 2014 के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि थे। वह भारत का 65वां गणतंत्र दिवस था। आबे  राजपथ पर आयोजित परेड समारोह को देखकर मंत्र मुग्ध हो गए थे। उन्हें परेड के माध्यम से भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक पहलुओं और सैन्य शक्ति को जानने का अवसर मिला था।

शिंजो आबे के अचानक से संसार से विदा होने से भारत का भी स्तब्ध होना लाजिमी है। कृतज्ञ भारत अपने इतने प्यारे मित्र को कभी नहीं भूल सकेगा। अब भारत को उनकी स्मृति को जिंदा रखने के लिए कोई पुरस्कार आदि की घोषणा करनी होगी। अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन.एफ कैनेडी व्हाइट हाउस में रहते हुए तो कभी भारत की यात्रा पर नहीं आए। पर उनके नाम पर खुशबू बिखेरता एक प्रतीक हमारे राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डन में है। दरअसल कैनेडी नाम के गुलाब के फूलों की एक प्रजाति मुगल गार्डन के मालियों ने उनकी हत्या के बाद विकसित की थी। कभी मुगल गॉर्डन जाएं तो कैनेडी की मधुर मुस्कान की तरह उनके नाम पर तैयार गुलाब के फूलों की सुंदर क्यारियों को भी निहार लें। आपको अच्छा लगेगा।

शिंजो आबे के बाद फिलहाल तो दुनिया में इस तरह का कोई राजनेता नजर नहीं आता जो भारत के प्रति सम्मान और प्रेम का संबंध ऱखता हो। अब सारी दुनिया अपने-अपने हितों को लेकर ही सोचने लगी है। इस परिस्थिति में न जाने कब भारत को कैनेडी या आबे जैसा कोई दोस्त मिले।

  (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तभकार और पूर्व सांसद हैं)

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